मंत्र — हिंदी सारांश

लेखक: मुंशी प्रेमचंद

श्रेणी: कहानी

पुस्तक का परिचय

मंत्र कहानी का सार प्रेमचंद की “मंत्र” कहानी का केंद्र किसी जादुई उपाय का महिमामंडन नहीं, बल्कि दो मनुष्यों की नैतिक तुलना है—एक ओर प्रतिष्ठित और शिक्षित डॉक्टर चड्ढा , दूसरी ओर गरीब वृद्ध भगत । कहानी की शुरुआत उस शाम से होती है जब डॉक्टर चड्ढा अपने मनोरंजन के लिए निकलने को तैयार हैं और एक बूढ़ा अपने गंभीर रूप से बीमार बेटे को डोली में लेकर उनसे सहायता माँगता है। बूढ़े की विनती के बावजूद डॉक्टर अपने तय खेलने के समय को प्राथमिकता देते हैं और रोगी को देखने से मना कर देते हैं। इलाज न मिलने पर भगत का बेटा मर जाता है। वर्षों बाद परिस्थिति उलट जाती है। डॉक्टर चड्ढा का पुत्र कैलाश साँपों में रुचि रखता है। एक अवसर पर साँप दिखाते समय उसे विषैला साँप काट लेता है। घर में अफरा-तफरी मच जाती है और उपलब्ध चिकित्सा-प्रयास असफल होते दिखाई देते हैं। खबर बूढ़े भगत तक पहुँचती है। उसके पास प्रतिशोध का पूरा नैतिक बहाना है: जिस डॉक्टर ने उसके बच्चे को देखने से इनकार किया था, आज वही अपने बेटे के लिए सहायता का आकांक्षी है। यहीं कहानी की असली परीक्षा शुरू होती है। भगत के भीतर बदले की भावना उठती है; वह स्वयं को रोकना चाहता है। लेकिन लंबे समय से दूसरों के प्राण बचाने की उसकी आदत, कर्तव्य-बोध और करुणा अंततः प्रतिशोध पर भारी पड़ती है। वह रात में डॉक्टर के घर पहुँचता है और कैलाश को बचाने के लिए अपना पारंपरिक उपचार और मंत्र करता है। कैलाश में जीवन के लक्षण लौटते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भगत इस सफलता को इनाम, प्रतिष्ठा या डॉक्टर पर नैतिक विजय में नहीं बदलता। वह चुपचाप चला जाता है। डॉक्टर चड्ढा के सामने त…

मुख्य विचार

- कहानी का मुख्य संघर्ष डॉक्टर चड्ढा और बूढ़े भगत के नैतिक व्यवहार के बीच है। डॉक्टर के पास पेशेवर ज्ञान है, लेकिन निर्णायक क्षण में करुणा और कर्तव्य की कमी दिखाई देती है; भगत के पास सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं, लेकिन वह प्राण-रक्षा को प्राथमिकता देता है। - पहली और दूसरी घटना एक-दूसरे का दर्पण हैं। पहले भगत का बेटा डॉक्टर की सहायता चाहता है; बाद में डॉक्टर का बेटा ऐसी स्थिति में पहुँचता है जहाँ भगत सहायता कर सकता है। यह उलटाव कहानी का नैतिक ढाँचा बनाता है। - भगत का सबसे बड़ा संघर्ष साँप के विष से पहले अपने भीतर के प्रतिशोध से है। कहानी का चरम केवल कैलाश का बचना नहीं, भगत का अपने दर्द के बावजूद सहायता करने निकल पड़ना है। - कैलाश की दुर्घटना डॉक्टर को वही असहायता महसूस कराती है जिसे उसने कभी भगत में नहीं पहचाना था। निजी दुःख उसे दूसरे गरीब पिता की पीड़ा समझने की स्थिति में लाता है। - करुणा लेन-देन नहीं है। भगत डॉक्टर को इसलिए नहीं बचाता कि उसे धन्यवाद, पैसा या सम्मान चाहिए; उसका चुपचाप चले जान…

और हिंदी पुस्तक सारांश देखें